कोई भी परभक्षी शिकार पकड़ने में पूर्णतः प्रवीण नहीं हो सकता, क्योंकि:
(d) परभक्षी तथा शिकार के बीच एक प्रकार की 'शस्त्र-दौड़' चलती है, जिसमें दोनों अपने-अपने लक्ष्य प्राप्त करने हेतु विकसित होते रहते हैं। साथ ही परभक्षी को शिकार मारने में विवेक भी रखना पड़ता है।