वनस्पति विज्ञान (Botany) NEET प्रश्न हिंदी में — उत्तर सहित MCQ अभ्यास

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प्रकाश श्वसन सामान्यतः कितने कोशिकांगों में होता है

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प्रकाश श्वसन में ऑक्सीजन का ग्रहण तथा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन प्रकाश पर निर्भर होता है। RuBP कार्बोक्सिलेज, RuBP ऑक्सीजनेज की भाँति कार्य करता है। प्रकाश श्वसन हरितलवक में होता है तथा इसमें परॉक्सीसोम एवं माइटोकॉन्ड्रिया की सहायता आवश्यक होती है।

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प्रकाश संश्लेषी जीवाणुओं में क्या नहीं होता

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 प्रकाश संश्लेषी जीवाणुओं में क्वांटासोम नहीं होता। प्रकाश संश्लेषी जीवाणु दो प्रकार के होते हैं — ऑक्सीजनी (सायनोबैक्टीरिया) तथा अनॉक्सीजनी (H2S दाता जैसे बैंगनी सल्फर एवं हरे सल्फर जीवाणु तथा कार्बनिक दाता जैसे बैंगनी असल्फर एवं हरे असल्फर जीवाणु)। जीवाणुओं में केवल एक ही प्रकाशतंत्र होता है, अर्थात् हरे सल्फर जीवाणुओं में टाइप I अभिक्रिया केंद्र (PS I - 700) तथा असल्फर जीवाणुओं में टाइप II अभिक्रिया केंद्र (PS II - 680)।

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C3 पादपों में प्रकाश श्वसन किससे प्रारंभ होता है:

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C3 पादपों में प्रकाश श्वसन का प्रारंभ राइबुलोस-1,5-बाइफॉस्फेट (RuBP) से फॉस्फोग्लाइकोलेट के निर्माण से होता है, जब कार्बन डाइऑक्साइड के स्थान पर ऑक्सीजन RuBP कार्बोक्सिलेज/ऑक्सीजनेज (रुबिस्को) एंजाइम से जुड़ती है। यह फॉस्फोग्लाइकोलेट फिर विफॉस्फोरिलीकृत होकर ग्लाइकोलेट बनाता है तथा प्रकाश-श्वसनीय पथ प्रारंभ होता है।

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हिल अभिक्रिया किसमें होती है:

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हिल अभिक्रिया जल का प्रकाश-चालित ऑक्सीकरण है जो पोटैशियम फेरिसायनाइड या बेंजोक्विनोन जैसे कृत्रिम इलेक्ट्रॉन ग्राही की उपस्थिति में होती है। इसकी खोज रॉबर्ट हिल ने 1937 में की थी तथा इसका उपयोग प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश-निर्भर अभिक्रियाओं के पृथक् अध्ययन के लिए किया जाता है।

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चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण में भाग लेता है

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चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण, प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण की वह प्रक्रिया है जिसमें उत्तेजित प्रकाश केंद्र द्वारा निकाला गया इलेक्ट्रॉन इलेक्ट्रॉन वाहकों की एक शृंखला से होकर पुनः उसी केंद्र पर लौट आता है। चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण केवल प्रकाशतंत्र I द्वारा किया जाता है। इलेक्ट्रॉन उसी प्रकाशतंत्र के भीतर परिचालित होता है तथा इलेक्ट्रॉन के चक्रीय प्रवाह के कारण फॉस्फोरिलीकरण होता है। उत्तेजित इलेक्ट्रॉन NADP+ तक नहीं जाता, बल्कि इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला द्वारा पुनः PS I संकुल में लौट आता है। अतः इस चक्रीय प्रवाह से केवल ATP का संश्लेषण होता है, NADPH + H+ का नहीं।

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कैल्विन चक्र का प्रथम स्थायी उत्पाद है 

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कैल्विन पथ सभी प्रकाश संश्लेषी पादपों में होता है तथा यह CO2 स्थिरीकरण चक्र है। कार्बन डाइऑक्साइड राइबुलोस-1, 5, बाइफॉस्फेट (RuBp) से संयोग करके एक क्षणिक मध्यवर्ती यौगिक बनाती है। यह मध्यवर्ती यौगिक जल की उपस्थिति में तुरंत टूटकर 3-फॉस्फोग्लिसरेट या 3-PGA के दो अणु बनाता है। यही प्रकाश संश्लेषण का प्रथम स्थायी उत्पाद है।

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PS-II केवल कहाँ पाया जाता है

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प्रकाशतंत्र II मुख्यतः ग्रैनल थाइलैकॉइड के संपीडित क्षेत्रों में पाया जाता है।

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निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

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C4 पादप C3 पादपों की तुलना में अधिक दक्ष होते हैं क्योंकि इनमें प्रकाश श्वसन बहुत कम होता है जबकि C3 पादपों में प्रकाश संश्लेषी कार्बन का आधे से अधिक भाग प्रकाश श्वसन में नष्ट हो जाता है। PEP (फॉस्फोइनॉल पाइरुविक अम्ल) की CO2 के प्रति उच्च बंधुता के कारण C4 पादप कम CO2 सांद्रता में भी CO2 ग्रहण करने में अधिक दक्ष होते हैं।

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प्रकाश श्वसन में किसका निर्माण होता है 

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प्रकाश श्वसन, पादप के प्रकाश संश्लेषी अंगों द्वारा राइबुलोस बाइफॉस्फेट (RuBP) के ऑक्सीजनीकरण तथा कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त करने की प्रकाश-निर्भर प्रक्रिया है। सामान्यतः प्रकाश संश्लेषी अंग प्रकाश में इसके विपरीत कार्य करते हैं, अर्थात् CO2 ग्रहण तथा O2 का उत्सर्जन। उच्च ताप पर RuBP कार्बोक्सिलेज ऑक्सीजनेज की भाँति कार्य करता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड का स्थिरीकरण (C3 चक्र) करने के स्थान पर राइबुलोस 1, 5-बाइफॉस्फेट का ऑक्सीकरण करके एक 3-कार्बन फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल तथा एक 2-कार्बन फॉस्फोग्लाइकोलेट बनाता है।

प्रकाश श्वसन न तो ऊर्जा उत्पन्न करता है और न ही अपचायक शक्ति। बल्कि यह ऊर्जा का उपभोग करता है। इसके अतिरिक्त यह प्रकाश संश्लेषण के कार्य को घटाता है। स्थिरीकृत CO2 की 25% हानि होती है। अतः प्रकाश श्वसन अत्यंत अपव्ययी प्रक्रिया है। यह केवल C3 पादपों में होता है। C4 पादपों ने प्रकाश श्वसन की समस्या पर विजय पा ली है।

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क्रांज शारीरिकी सामान्यतः किससे संबंधित है 

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C4 पादप शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के अनुकूलित होते हैं तथा इनमें जैवभार की उत्पादकता अधिक होती है। इनमें एक विशेष प्रकार की पर्ण शारीरिकी होती है जिसे क्रांज शारीरिकी कहते हैं। इस प्रकार की शारीरिकी में पूलाच्छद कोशिकाएँ संवहन पूलों के चारों ओर अनेक स्तर बनाती हैं; इनकी विशेषता है अधिक संख्या में हरितलवक, गैसीय विनिमय के लिए अपारगम्य मोटी भित्तियाँ तथा अंतरकोशिकीय अवकाशों का अभाव।

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