सामान्य प्रकार का भ्रूणकोश 8-केंद्रकी तथा होता है
इसे प्रारूपी भ्रूणकोश कहते हैं, अर्थात्, Polygonum का अभिलक्षण।
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सामान्य प्रकार का भ्रूणकोश 8-केंद्रकी तथा होता है
इसे प्रारूपी भ्रूणकोश कहते हैं, अर्थात्, Polygonum का अभिलक्षण।
भ्रूणकोश है
बीजांडकाय में उपस्थित भ्रूणकोश को मादा युग्मकोद्भिद भी कहते हैं।
भिन्न पादपों पर स्थित दो पुष्पों का परागण कहलाता है
परपुष्पी परागण भिन्न पादपों के दो पुष्पों के बीच होने वाला पर-परागण है।
सजातपुष्पी परागण उसी पादप के दो पुष्पों के बीच होने वाला पर-परागण है।
अनुन्मील परागण वह परिघटना है जिसमें पादपों का समूह अपने लिंग अंगों को उजागर किए बिना बीज बनाता है। यह स्वपरागण को बढ़ावा देने वाला सर्वाधिक दक्ष पुष्पीय अनुकूलन है और यह अंतर्निहित या पारिस्थितिक हो सकता है।
भिन्नकालपक्वता से तात्पर्य नर तथा मादा लिंग अंगों के भिन्न-भिन्न समय पर परिपक्व होने से है। यह स्वपरागण के विरुद्ध एक सुरक्षा है।
कुछ बीजों में बीजांडकाय के अवशेष भी बने रहते हैं। यह अवशिष्ट, बना रहने वाला बीजांडकाय है
परिभ्रूणपोष कुछ बीजों में भ्रूण वाले कोश के बाहर स्थित पोषक ऊतक है।
निम्नलिखित में से क्या पुंतंतु के समीपस्थ सिरे से जुड़ा होता है?
प्रारूपी पुंकेसर के दो भाग हैं – लंबा एवं पतला वृंत जिसे पुंतंतु कहते हैं, तथा अंतस्थ सामान्यतः द्विपालि संरचना जिसे परागकोश कहते हैं। पुंतंतु का समीपस्थ सिरा पुष्प के पुष्पासन अथवा दल से जुड़ा रहता है।
एक प्रारूपी आवृतबीजी द्विपालि तथा द्विकोष्ठी परागकोश में कितने कोष्ठ होते हैं?
प्रत्येक परागकोश द्विपालि होता है तथा प्रत्येक पालि द्विकोष्ठी होती है, अर्थात् एक प्रारूपी आवृतबीजी परागकोश में चार कोष्ठ उपस्थित होते हैं।
आवृतबीजी परागकोश की प्रत्येक पालि में लघुबीजाणुधानियों की संख्या कितनी है?
परागकोश एक चतुष्पार्श्वीय (चतुष्कोणीय) संरचना है जिसमें कोनों पर स्थित चार लघुबीजाणुधानियाँ होती हैं, प्रत्येक पालि में दो।
निम्नलिखित में से कौन परागकोश का लक्षण नहीं है?
वियुक्तांडपी होना जायांग का लक्षण है, परागकोश का नहीं। जब एक से अधिक जायांग हों, तो वे आपस में जुड़े (युक्तांडपी) या स्वतंत्र (वियुक्तांडपी) हो सकते हैं।
निम्नलिखित में से कौन लघुबीजाणुधानी की भित्ति परत नहीं है?
बीजांडकाय पादप के मादा जनन भाग- बीजांड में उपस्थित होता है।
निम्नलिखित सभी कथन सही हैं, सिवाय:
(4) अनुप्रस्थ काट में प्रारूपी लघुबीजाणुधानी की रूपरेखा लगभग वृत्ताकार दिखाई देती है।
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