जटिल जंतुओं के शरीर में सर्वाधिक प्रचुर तथा व्यापक रूप से वितरित ऊतक है:
XI NCERT का पृष्ठ 102 देखें
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जटिल जंतुओं के शरीर में सर्वाधिक प्रचुर तथा व्यापक रूप से वितरित ऊतक है:
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गैप संधि का कार्य है
गैप संधि को नेक्सस अथवा मैक्युला कम्युनिकेंस भी कहा जाता है। ये अनेक प्रकार की जंतु कोशिकाओं के बीच विशिष्ट अंतराकोशिकीय संयोजन हैं। ये दो कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य को सीधे जोड़ती हैं, जिससे विभिन्न अणु, आयन तथा वैद्युत आवेग कोशिकाओं के बीच एक नियंत्रित द्वार से होकर सीधे गुजर सकते हैं।
सही सुमेलित युग्म चुनिए।
एरिओलर ऊतक एक शिथिल संयोजी ऊतक है तथा लचीलापन एवं गद्देदार आधार प्रदान करता है। वसा ऊतक भी शिथिल संयोजी ऊतक है, जबकि कंडरा एक सघन संयोजी ऊतक है, जो पेशियों को अस्थि से जोड़ती है। उपास्थि कॉन्ड्रोसाइट कहलाने वाले विशिष्ट संयोजी ऊतक से बनी होती है, जो कोलैजन तंतुओं से बना बड़ी मात्रा में बाह्यकोशिकीय आधात्री उत्पन्न करती हैं।
रुधिर वाहिकाओं की आंतरिक भित्ति बनाने वाली उपकला का प्रकार है
सरल शल्की उपकला में चपटी, शल्क जैसी, प्रायः बहुभुजी कोशिकाओं की केवल एक ही परत होती है, जो मोजैक की टाइलों की भाँति एक-दूसरे से सटी हुई होती हैं। इसे फर्शी उपकला भी कहते हैं। यह रुधिर वाहिकाओं, लसीका वाहिकाओं, हृदय, पेरिटोनियम, प्लूरा, बोमन संपुट आदि का आस्तर बनाती है।
श्वसनिकाओं तथा अंडवाहिनियों की आंतरिक सतह पर उपस्थित उपकला ऊतक है
पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला श्वसन मार्ग (श्वसनियों का निचला सिरा), अंडवाहिनियों, मस्तिष्क के निलयों (एपेंडाइमा), मेरुरज्जु की केंद्रीय नाल आदि का आस्तर बनाती है।
घनाकार उपकला वृक्कों के वृक्काणुओं के कुछ भागों में पाई जाती है।
ग्रंथिल उपकला स्रावी क्रियाओं हेतु विशिष्टीकृत होती है, जैसे एककोशिकीय, बहुकोशिकीय, बहिःस्रावी, अंतःस्रावी, मिश्रस्रावी ग्रंथियाँ आदि।
शल्की उपकला रुधिर वाहिकाओं, लसीका वाहिका, हृदय, पेरिटोनियम, प्लूरा, बोमन संपुट आदि का आस्तर बनाती है।
दृढ़, आसंजी तथा गैप संधि कहलाने वाली कोशिका संधियाँ किसमें पाई जाती हैं
उपकला ऊतक में स्थान-स्थान पर संलग्न कोशिकाएँ अंतराकोशिकीय संचार तथा रासायनिक विनिमय हेतु आयन-समृद्ध गैप अथवा कोशिका संधियाँ बनाती हैं। ये संधियाँ संभवतः भौतिक सहारा प्रदान नहीं करतीं।
निम्नलिखित में से किस प्रतिदर्श में आपको कोशिका संधियाँ प्रायः मिलने की संभावना है?
विशिष्ट कोशिका संधियाँ सभी ऊतकों में कोशिका-कोशिका तथा कोशिका-आधात्री संपर्क के अनेक बिंदुओं पर पाई जाती हैं, परंतु उपकला में ये विशेष रूप से महत्वपूर्ण एवं प्रचुर होती हैं।
संलग्न कोशिकाएँ किसके द्वारा आपस में जुड़ी होती हैं
डेस्मोसोम अंतराकोशिकीय कोशिका संधियाँ हैं, जो जंतु ऊतकों में संलग्न कोशिकाओं के बीच प्रायः संकरे अंतराल होते हैं। इन क्षेत्रों में कोशिका झिल्ली के वृत्ताकार धब्बे उन प्रोटीनों की अंतःक्रिया द्वारा एक साथ बँधे रहते हैं, जो प्रत्येक झिल्ली से होकर कोशिकाओं के बीच के स्थान तक फैले होते हैं। कोशिका झिल्ली की आंतरिक ओर प्रोटीन की एक सघन पट्टिका होती है तथा उस पर टोनोफाइब्रिल कहलाने वाले महीन तंतु होते हैं, जो कोशिका के भीतर विकिरित होते हैं। डेस्मोसोम "स्पॉट वेल्ड" की भाँति कार्य करते हैं तथा कोशिकाओं को दृढ़ता से एक साथ बनाए रखते हैं। ये उपकला कोशिकाओं के बीच पाए जाते हैं।
टैडपोल में उत्सर्जन होता है
टैडपोल अमोनिया का उत्सर्जन करता है, परंतु वयस्क मेंढक यूरिया उत्सर्जन की ओर बदल जाता है। उभयचर त्वचा के द्वारा आयनों का सक्रिय परिवहन भीतर की ओर करते हैं। टैडपोल के यकृत में सामान्यतः यूरिया चक्र के एन्जाइमों का स्तर उच्च नहीं होता तथा कायांतरण होने तक यह स्तर नहीं बढ़ता।
सरल घनाकार उपकला निम्नलिखित सभी संरचनाओं का आस्तर बनाती है, सिवाय
घनाकार उपकला में घनाकार कोशिकाएँ होती हैं, जो लंबी एवं चौड़ी होती हैं तथा जिनका केंद्रक मध्य में स्थित होता है (बाह्यरेखा में बहुभुजी)। यह श्वसन श्वसनिकाओं, स्वेद ग्रंथियों, लार ग्रंथियों तथा अवटु पुटिकाओं का आस्तर बनाती है। (प्रकृति में स्रावी)। घनाकार उपकला की कोशिकाएँ प्रायः अपनी मुक्त सतहों पर सूक्ष्मांकुर बनाती हैं, जिससे ब्रश जैसा रूप दिखाई देता है; इसीलिए इसे ब्रश किनारीयुक्त घनाकार उपकला कहते हैं (जैसे मूत्रजन नलिकाओं का समीपस्थ भाग)। यह अग्न्याशयी वाहिनी (अस्रावी), वृषण (शुक्रजनक नलिकाएँ) तथा अंडाशय का भी आस्तर बनाती है। अंडाशयों तथा वृषण में इसे जननिक उपकला कहते हैं, क्योंकि ये घनाकार कोशिकाएँ युग्मक (क्रमशः अंडाणु तथा शुक्राणु) उत्पन्न करने में सक्षम होती हैं। घनाकार कोशिकाओं में पक्ष्माभ भी होते हैं, जो वृक्क के वृक्काणुओं के कुछ भागों में पाए जाते हैं। इसीलिए इसे पक्ष्माभी घनाकार उपकला कहते हैं।
अंडवाहिनी का आस्तर पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला बनाती है।
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