किसी जीन का एक सहलग्नता समूह से दूसरे में जाना कहलाता है
(b) किसी जीन का एक सहलग्नता समूह से दूसरे में जाना स्थानांतरण कहलाता है। यह असमजात गुणसूत्रों के बीच भागों के पुनर्विन्यास से उत्पन्न गुणसूत्रीय अनियमितता है।
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किसी जीन का एक सहलग्नता समूह से दूसरे में जाना कहलाता है
(b) किसी जीन का एक सहलग्नता समूह से दूसरे में जाना स्थानांतरण कहलाता है। यह असमजात गुणसूत्रों के बीच भागों के पुनर्विन्यास से उत्पन्न गुणसूत्रीय अनियमितता है।
बहुविकल्पी युग्मविकल्पी कहाँ उपस्थित होते हैं
(c) बहुविकल्पता वह दशा है जिसमें कोई जीन दो से अधिक युग्मविकल्पी रूपों में विद्यमान होता है जो गुणसूत्र के उसी स्थल पर उपस्थित रहते हैं। जैसे: मनुष्यों में ABO तंत्र।
निम्नलिखित में से किसकी व्याख्या मेंडल के प्रभाविता नियम के आधार पर नहीं की जा सकती?
प्रभाविता का नियम सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं होता। मेंडल के बाद वैज्ञानिकों ने अनेक ऐसे प्रकरण अभिलिखित किए जहाँ प्रभाविता नियम से स्पष्ट विचलन अपूर्ण प्रभाविता या मिश्रित वंशागति तथा सहप्रभाविता के रूप में देखा गया।
जहाँ F1 पीढ़ी के संकरों ने दोनों जनकों के लक्षणों का मिश्रण दर्शाया, उस प्रकरण को अपूर्ण प्रभाविता या मिश्रित वंशागति माना जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि युग्मविकल्पी युग्म के दोनों जीन प्रभावी-अप्रभावी के रूप में संबंधित नहीं हैं, बल्कि उनमें से प्रत्येक आंशिक रूप से अपनी अभिव्यक्ति करता है। गुलबाँस पादप में जब लाल पुष्प वाले पादपों का श्वेत पुष्प वाले पादपों से संकरण कराया जाता है, तो F1 संकर गुलाबी पुष्प देते हैं। इन गुलाबी पुष्पों का स्वपरागण कराने पर लाल, गुलाबी तथा श्वेत पुष्प क्रमशः 1 : 2 : 1 के अनुपात में बनते हैं।
प्रभावी लक्षणप्ररूप दर्शाने वाले पादप का जीनप्ररूप किसके द्वारा निर्धारित किया जा सकता है
आनुवंशिकी में परीक्षार्थ संकरण, जिसे सर्वप्रथम ग्रेगर मेंडल ने प्रस्तुत किया, यह निर्धारित करने के लिए प्रयुक्त होता है कि प्रभावी लक्षण दर्शाने वाला कोई व्यष्टि उस लक्षण के लिए समयुग्मजी है या विषमयुग्मजी। सरल शब्दों में, परीक्षार्थ संकरण प्रभावी लक्षणप्ररूप वाले व्यष्टि का जीनप्ररूप निर्धारित करता है। कुछ स्रोतों में परीक्षार्थ संकरण को अप्रभावी समयुग्मजी तथा F1 पीढ़ी के बीच एक प्रकार का प्रतीप संकरण बताया गया है।
मनुष्यों में ABO रुधिर वर्गों का नियंत्रण जीन I द्वारा होता है। इसके तीन युग्मविकल्पी हैं — IA, IB तथा i। चूँकि तीन भिन्न युग्मविकल्पी हैं, अतः छह भिन्न जीनप्ररूप संभव हैं। कितने लक्षणप्ररूप हो सकते हैं?
ABO रुधिर वर्ग तंत्र में वर्गीकरण की वंशागति का नियंत्रण गुणसूत्र 9 पर स्थित एक ही अलिंगसूत्री जीन द्वारा होता है जिसके तीन प्रमुख युग्मविकल्पी A, B तथा O ( IA, IB तथा iO) हैं। ABO रुधिर वर्ग तंत्र में कम से कम 6 जीनप्ररूप होते हैं। प्रतिजनों एवं प्रतिरक्षियों की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर चार रुधिर वर्ग (लक्षणप्ररूप) पहचाने गए हैं — A, B, AB तथा O रुधिर वर्ग।
द्विसंकर संकरण के संदर्भ में नीचे दिए गए कथनों में से सही कथन चुनिए।
पुनर्योजन अर्धसूत्रण के दौरान जीनों का पुनर्विन्यास है जिससे किसी युग्मक में नए जीन संयोजन वाला अगुणित जीनप्ररूप आ जाता है। मॉर्गन तथा उनके समूह ने पाया कि जब जीन एक ही गुणसूत्र पर समूहित होते हैं, तो कुछ जीन बहुत दृढ़ता से सहलग्न होते हैं (बहुत कम पुनर्योजन दर्शाते हैं), जबकि अन्य शिथिल रूप से सहलग्न होते हैं (अधिक पुनर्योजन दर्शाते हैं)।
मनुष्यों में त्वचा के रंग की वंशागति किसका उदाहरण है :
मनुष्यों में त्वचा के रंग की वंशागति बहुजीनी वंशागति अथवा बहुकारक वंशागति का परिणाम है। मानव त्वचा के रंग की वंशागति का अध्ययन सी.बी. डेवनपोर्ट ने 1913 में किया।
वंशागति की किस विधि में आप संतति में अधिक मातृ प्रभाव की अपेक्षा करेंगे ?
अधिक मातृ प्रभाव की अपेक्षा कोशिकाद्रव्यी वंशागति में की जा सकती है (अर्थात् कोशिका के केंद्रक के बजाय कोशिकाद्रव्य में स्थित जीनों की वंशागति)। कारण यह है कि मादा जनन कोशिका अथवा अंड में बड़ी मात्रा में कोशिकाद्रव्य होता है जिसमें ऐसे अनेक कोशिकांग रहते हैं जिनके अपने जीन होते हैं तथा जो स्वतंत्र रूप से जनन कर सकते हैं (जैसे, माइटोकॉन्ड्रिया एवं हरितलवक) और जो परिणामस्वरूप भ्रूण की सभी कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में सम्मिलित हो जाते हैं। नर जनन कोशिकाएँ (शुक्राणु या पराग) लगभग पूर्णतः केंद्रक से ही बनी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्यी कोशिकांग नर जनक से वंशागत नहीं होते।
इसीलिए कोशिकाद्रव्यी वंशागति को मातृ वंशागति भी कहते हैं।
Y-गुणसूत्र पर स्थित जीन Y-जीन कहलाते हैं तथा उनकी वंशागति Y-सहलग्न वंशागति कहलाती है। यह पितृ प्रभाव वहन करती है।
X-गुणसूत्र पर स्थित जीन X-सहलग्न कहलाता है तथा उसकी वंशागति X-सहलग्न वंशागति कहलाती है। इसमें नर अपना X-गुणसूत्र केवल अपनी पुत्रियों को देता है जबकि मादा अपने दोनों लिंगों की संतति को अपने X-गुणसूत्रों में से एक देती है।
AABbCC जीनप्ररूप वाला पादप कितने भिन्न प्रकार के युग्मक उत्पन्न करेगा ?
किसी पादप द्वारा उत्पन्न युग्मकों के प्रकार विषमयुग्मजी युग्मों की संख्या पर निर्भर करते हैं।
युग्मकों के प्रकारों की संख्या = Zn
n = विषमयुग्मजी युग्मों की संख्या
21 = 2
युग्मक हैं — ABC तथा AbC।
निम्नलिखित में से कौन बहुजीनी वंशागति का उदाहरण है ?
बहुजीनी वंशागति में किसी विशेष लक्षणप्ररूपी अभिलक्षण का निर्धारण अनेक जीनों द्वारा होता है, जिन्हें बहुजीन कहते हैं (अर्थात् किसी मात्रात्मक अभिलक्षण को प्रभावित करने वाला जीन समूह), और इनमें से प्रत्येक का व्यक्तिगत प्रभाव अल्प होता है।
इस प्रकार नियंत्रित अभिलक्षण सतत विविधता दर्शाते हैं तथा बहुजीनी लक्षण कहलाते हैं, जैसे मनुष्यों में लंबाई तथा त्वचा का रंग।
बहुजीनी वंशागति को बहुकारक वंशागति अथवा मात्रात्मक वंशागति कहते हैं।
Mirabilis jalapa में गुलाबी पुष्प का रंग अपूर्ण प्रभाविता का उदाहरण है जबकि नर मधुमक्खी का उत्पादन अनिषेकजनन का उदाहरण है।
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