ईथर अणु में C-O-C कोण का मान है :
आबंध कोण 110 है, जो स्थूल ऐल्किल समूहों की त्रिविम बाधा के कारण है।
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ईथर अणु में C-O-C कोण का मान है :
आबंध कोण 110 है, जो स्थूल ऐल्किल समूहों की त्रिविम बाधा के कारण है।
एथिल ऐल्कोहॉल को इस नाम से भी जाना जाता है:
C2H5OH अनाजों से प्राप्त होता है, वाइन के रूप में प्रयुक्त होता है तथा मेथिल कार्बिनॉल कहलाता है।
निम्नलिखित अभिक्रिया में बनने वाले उत्पाद, C6H5-O-CH3 + HI हैं:
(a) C6H5OCH3 + HI C6H5OH + CH3I
फीनॉल अनुनाद के कारण स्थायित्व दर्शाता है।
CHCHXY है:
(a) CHOCHO CH2OHCH2OH
(X)
निम्नलिखित में से कौन-सा जल के साथ अभिक्रिया करता है
(c) क्लोरल H-आबंधन के कारण जल के साथ क्लोरल हाइड्रेट बनाता है।
CCl3CHOCCl3CH(OH)2
पिक्रिक अम्ल तथा बेंजोइक अम्ल को किसके द्वारा विभेदित किया जा सकता है:
पिक्रिक अम्ल में फीनॉलीय समूह होता है।
ब्यूटेन-2-ऑल है:
(b) इसमें >CHOH समूह होता है।
CH3CH2ClX YZ
उपर्युक्त अभिक्रिया अनुक्रम में, Z है
(a) CH3CH2ClCH3-CH2-CN CH3-CH2CH2NH2 X Y CH3-CH2-CH2-NHCOCH3
Z
एस्टर के निर्माण में सामान्यतः प्रयुक्त निर्जलीकारक है :
(d) H2SO4 अभिक्रिया के लिए उत्प्रेरक तथा निर्जलीकारक दोनों की भाँति कार्य करता है,
CH3COOH+HOC2H5CH3COOC2H5
ऐलिल ऐल्कोहॉल, (CH2=CH-CH2OH) का ऑक्सीकरण ऑक्सैलिक अम्ल तथा फॉर्मिक अम्ल का मिश्रण देता है। यदि यह ऑक्सीकरण ब्रोमीन की उपस्थिति में किया जाए, तो केवल किसकी अपेक्षा की जाएगी:
(d) केवल CH2OH समूह ही -COOH में ऑक्सीकृत होता है; द्विआबंध प्रभावित नहीं होता।
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