सरल घनाकार उपकला निम्नलिखित सभी संरचनाओं का आस्तर बनाती है, सिवाय
घनाकार उपकला में घनाकार कोशिकाएँ होती हैं, जो लंबी एवं चौड़ी होती हैं तथा जिनका केंद्रक मध्य में स्थित होता है (बाह्यरेखा में बहुभुजी)। यह श्वसन श्वसनिकाओं, स्वेद ग्रंथियों, लार ग्रंथियों तथा अवटु पुटिकाओं का आस्तर बनाती है। (प्रकृति में स्रावी)। घनाकार उपकला की कोशिकाएँ प्रायः अपनी मुक्त सतहों पर सूक्ष्मांकुर बनाती हैं, जिससे ब्रश जैसा रूप दिखाई देता है; इसीलिए इसे ब्रश किनारीयुक्त घनाकार उपकला कहते हैं (जैसे मूत्रजन नलिकाओं का समीपस्थ भाग)। यह अग्न्याशयी वाहिनी (अस्रावी), वृषण (शुक्रजनक नलिकाएँ) तथा अंडाशय का भी आस्तर बनाती है। अंडाशयों तथा वृषण में इसे जननिक उपकला कहते हैं, क्योंकि ये घनाकार कोशिकाएँ युग्मक (क्रमशः अंडाणु तथा शुक्राणु) उत्पन्न करने में सक्षम होती हैं। घनाकार कोशिकाओं में पक्ष्माभ भी होते हैं, जो वृक्क के वृक्काणुओं के कुछ भागों में पाए जाते हैं। इसीलिए इसे पक्ष्माभी घनाकार उपकला कहते हैं।
अंडवाहिनी का आस्तर पक्ष्माभी स्तंभाकार उपकला बनाती है।