पृथक छोटी जनजातीय समष्टियों के विषय में क्या सत्य है?
समष्टि को एक ही जाति के जीवों के ऐसे समूह या समुच्चय के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो किसी दिए गए समय में किसी विशेष क्षेत्र में रहते हैं। मनुष्यों में आँख की रेटिना में रंग-संवेदी कोशिकाओं, शंकुओं, के निर्माण के लिए एक प्रभावी X-सहलग्न जीन आवश्यक है। इस जीन का अप्रभावी रूप रंग-संवेदी शंकु बनाने में असमर्थ होता है और समयुग्मजी अप्रभावी स्त्रियाँ तथा समयुग्मजी अप्रभावी पुरुष इन दो रंगों में भेद नहीं कर पाते। चूँकि पृथक समष्टि में वर्णांधता जैसे कोई वंशानुगत रोग नहीं होते, इसलिए वे तदनुसार नहीं फैलते।
लैमार्क के उपार्जित लक्षणों की वंशागति के सिद्धांत के अनुसार, जिन पहलवानों ने अपने जीवनकाल में मज़बूत शारीरिक पेशियाँ विकसित कीं, उन्हें यह लक्षण अपनी संतति को देना चाहिए, किंतु यह सत्य नहीं पाया गया।
जीन पूल को मेंडलीय समष्टि में उपस्थित जीनों के कुल योग के रूप में परिभाषित किया जाता है। जीन पूल का अध्ययन हमें समष्टि में उपस्थित जीनों की कुल संख्या, उनके प्रकार और विविधता बताता है।