मधुमक्खियों की अनेक स्पीशीज़ हैं जिन्हें पाला जा सकता है। इनमें से भारत में पाली जाने वाली स्पीशीज़ है:
XII NCERT का पृष्ठ 169 पढ़ें
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मधुमक्खियों की अनेक स्पीशीज़ हैं जिन्हें पाला जा सकता है। इनमें से भारत में पाली जाने वाली स्पीशीज़ है:
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किसी पादप प्रजनन कार्यक्रम के निम्नलिखित चरणों को सही कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए:
I. श्रेष्ठ पुनर्योगजों का चयन तथा परीक्षण
II. विविधता का संग्रहण
III. चयनित जनकों के बीच पर-संकरण
IV. जनकों का मूल्यांकन तथा चयन
V. नई कृष्य किस्मों का परीक्षण, विमोचन तथा व्यावसायीकरण
XII NCERT का पृष्ठ 171 पढ़ें
दुग्ध उत्पादन में औसत से कम उत्पादकता वाले जंतुओं के लिए सर्वोत्तम प्रजनन विधि होगी:
XII NCERT का पृष्ठ 168 पढ़ें
मूँग में पीत मोज़ेक विषाणु तथा चूर्णी फफूँदी के प्रति प्रतिरोध किसके द्वारा लाया गया:
1. XII NCERT का पृष्ठ 174 पढ़ें
पूसा शुभ्रा, फूलगोभी की एक उन्नत किस्म, किसके प्रति प्रतिरोधी है:
XII NCERT का पृष्ठ 174
विषाणु-मुक्त पादप प्राप्त करने हेतु सूक्ष्मप्रवर्धन में किसे कर्तोतक (एक्सप्लांट) के रूप में प्रयोग किया जा सकता है ?
XII NCERT का पृष्ठ 177
पादपों में कायिक भ्रूण पुनरुद्भवन सामान्यतः किसकी अपेक्षाकृत उच्च सांद्रता द्वारा प्रेरित किया जाता है:
2,4-D (2,4-डाइक्लोरोफीनॉक्सीऐसीटिक अम्ल) एक कार्बनिक यौगिक है। यह एक शाकनाशी है जो कुछ कोशिकाओं की वृद्धि का ढंग बदलकर पादपों को मार देता है। 2,4-D अनेक रासायनिक रूपों में उपलब्ध है, जिनमें लवण, एस्टर तथा अम्ल रूप सम्मिलित हैं।
कायिक भ्रूणोद्भवन के प्रेरण तथा भ्रूणों के गुणन के लिए ऑक्सिन, मुख्यतः 2,4-डाइक्लोरोफीनॉक्सीऐसीटिक अम्ल (2,4-D), आवश्यक होता है, जिससे अप्रत्यक्ष कायिक भ्रूणोद्भवन द्वारा उत्पन्न किए जा सकने वाले भ्रूणों की संख्या बढ़ाई जा सके
विभज्योतक संवर्धन विशेष रूप से किसे प्राप्त करने हेतु महत्वपूर्ण है:
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ग्लाइफोसेट हेतु अभियांत्रित फसलें किसके प्रति प्रतिरोधी/सहिष्णु होती हैं
ग्लाइफोसेट (N-फॉस्फोनोमेथिल ग्लाइसीन) एक तंत्रगामी व्यापक-स्पेक्ट्रम शाकनाशी है जिसका प्रयोग खरपतवारों, विशेषकर चौड़ी पत्ती वाले पौधों तथा घासों, को मारने के लिए किया जाता है। शाकनाशी सहिष्णुता (प्रतिरोध) वाली नई फसलें बनाने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है।
निम्नलिखित में से कौन एक लोकप्रिय कवकनाशी के रूप में बोर्डो मिश्रण की खोज से जुड़ा है?
बोर्डो मिश्रण की खोज मिलार्डे ने 1882 में फ्रांस में की थी। इसे 40 g कॉपर सल्फेट तथा 40 g कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड को 5 L जल में घोलकर बनाया जाता है। इसका पहला प्रयोग अंगूर की लता के मृदुरोमिल आसिता रोग को नियंत्रित करने हेतु किया गया था, जो कवक Plasmopara viticola से होता है। गेहूँ का काला किट्ट Puccinia graminis tritici से होता है। कवकनाशी डाइथेन
Z-78 तथा डाइथेन M-45 का प्रयोग कम सांद्रता पर भी इस रोग को नियंत्रित कर लेता है।
गेहूँ का ढीला कंडुआ Ustilago tritici से होता है। कवकनाशियों (तंत्रगामी कवकनाशी जैसे D-735 तथा F-461) का प्रयोग काफी उत्साहजनक परिणाम देता है।
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