वनस्पति विज्ञान (Botany) NEET प्रश्न हिंदी में — उत्तर सहित MCQ अभ्यास

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पुष्पी पादपों में संवहन ऊतक किससे विकसित होते हैं

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Explanation

प्ररोह शीर्षस्थ विभज्योतक के लिए ऊतकजन सिद्धांत हैन्स्टीन (1870) द्वारा प्रस्तावित किया गया। इसके अनुसार तीन भिन्न विभज्योतकी क्षेत्र (परतें) होते हैं जिन्हें त्वचाजन, वल्कुटजन तथा रंभजन कहते हैं। त्वचाजन सबसे बाहरी ऊतकजन है जो अधिचर्म बनाता है, वल्कुटजन मध्य वाला है जो वल्कुट बनाता है तथा रंभजन सबसे भीतरी है जिससे केंद्रीय रंभ (ie, अर्थात् संवहन ऊतक) बनता है।

कॉर्क एधा (फेलोजन) बाहरी वल्कुट क्षेत्र में पाया जाने वाला द्वितीयक पार्श्व विभज्योतक है। इसकी कोशिकाएँ परिनतिक रूप से विभाजित होकर बाहर की ओर (कॉर्क अथवा फेलम बनाते हुए) तथा भीतर की ओर (द्वितीयक वल्कुट अथवा फेलोडर्म बनाते हुए) कोशिकाएँ काटती हैं।

 

पादपों में द्वितीयक वृद्धि के गहन अध्ययन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म उपयुक्त है:

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(b) व्यास अथवा मोटाई में वृद्धि संवहन एधा तथा कॉर्क एधा की क्रियाशीलता के फलस्वरूप द्वितीयक ऊतकों के निर्माण के कारण होती है। यह द्वितीयक वृद्धि द्विबीजपत्री तने तथा जड़ का लक्षण है।

वाहिका अवयवों तथा चालनी नलिका अवयवों का एक सामान्य संरचनात्मक लक्षण है :-

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पादप संवहन ऊतक में जाइलम का एक महत्वपूर्ण अभिन्न अवयव जाइलम वाहिका है जो केंद्रकविहीन होती है। फ्लोएम में चालनी नलिकाओं की एक पंक्ति होती है जो परिपक्वता पर केंद्रकविहीन होती हैं।

यदि रंध्र सीमित संख्या में ऐसी कोशिकाओं से घिरा रहे जिन्हें अन्य अधिचर्मी कोशिकाओं से अलग नहीं पहचाना जा सकता, तो इस प्रकार के रंध्र कहलाते हैं।

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(d) एनोमोसाइटिक रंध्रों में द्वार कोशिकाओं को घेरने वाली सहायक कोशिकाएँ नहीं होतीं। एनिसोसाइटिक रंध्र में तीन सहायक कोशिकाएँ होती हैं जिनमें से एक स्पष्ट रूप से
अन्य दो से छोटी होती है। पैरासाइटिक रंध्र के दोनों ओर एक या अधिक सहायक कोशिकाएँ होती हैं जो
छिद्र तथा द्वार कोशिकाओं के दीर्घ अक्ष के समांतर स्थित रहती हैं। पेरिजीनस रंध्र में द्वार कोशिकाओं तथा सहायक कोशिकाओं का उद्भव स्वतंत्र होता है।

पूलीय एधा जाइलम तथा फ्लोएम को किसमें पृथक करती है:-

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(a) द्विबीजपत्री तनों में जाइलम तथा फ्लोएम के बीच प्राथमिक विभज्योतक की एक पतली पट्टी उपस्थित होती है, जिसे पूलीय अथवा संवहन एधा कहते हैं। एधा कोशिकाएँ आयताकार तथा पतली भित्ति वाली होती हैं। एधा एक परत वाली होती है। एकबीजपत्री तने में एधा अनुपस्थित होती है।

अधिचर्म किससे व्युत्पन्न होता है:-

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(d) अधिचर्म पादप का सबसे बाहरी आवरण है जो बाह्य पर्यावरण के सीधे संपर्क में रहता है। यह एक परत अथवा बहुपरत वाली संरचना है जो सुरक्षा, अवशोषण, उत्सर्जन, गैसीय विनिमय, वाष्पोत्सर्जन तथा स्रवण में सहायक होती है। अधिचर्म त्वचाजन से व्युत्पन्न होता है जो प्ररोह शीर्ष की सबसे बाहरी आद्यक है।

कॉर्क एधा से कॉर्क का निर्माण होता है जो किसके संचय के कारण जल के लिए अपारगम्य हो जाता है

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कॉर्क एधा एक द्वितीयक पार्श्व विभज्योतक है जो अधःत्वचा अथवा बाहरी वल्कुट की स्थायी जीवित कोशिकाओं से उत्पन्न हो सकती है। यह विभज्योतकी कोशिकाओं की एकल परत से बनी होती है। इसकी कोशिकाएँ स्पर्शरेखीय तथा परिनतिक रूप से बाहरी सतह की ओर विभाजित होकर कॉर्क कोशिकाएँ बनाती हैं। ये कोशिकाएँ सघन रूप से व्यवस्थित होती हैं तथा प्रारंभ में इनकी पतली सेलुलोस भित्ति होती है। परिपक्व होने पर जीवित पदार्थ धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है और कोशिकाएँ त्रिज्य, ऊर्ध्वाधर अथवा स्पर्शरेखीय रूप से दीर्घित हो जाती हैं। सुबेरिन नामक वसीय पदार्थ के विकास के कारण कोशिका भित्तियाँ मोटी हो जाती हैं, जो जल के लिए अपारगम्य होती है।

चालनी अवयवों में निम्नलिखित में से कौन-सा P-प्रोटीन का सर्वाधिक संभावित कार्य है?

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(d) चालनी अवयव फ्लोएम ऊतक के घटक हैं तथा पादपों में भोजन के संवहन के लिए उत्तरदायी हैं। चालनी नलिका अवयव में केंद्रक रहित कोशिकाद्रव्य की परिधीय परत होती है। केंद्रीय भाग में नलिकाओं का जाल होता है जिसमें P-प्रोटीन के तंतुक होते हैं। यह प्रोटीन गतिशील है तथा माना जाता है कि यह पोषकों के परिवहन में सक्रिय रूप से भाग लेता है। इसका एक सामान्य गुण जेल बनाने की क्षमता है तथा यह क्षति-मरम्मत पदार्थ का कार्य करते हुए चालनी अवयव में क्षति के स्थान पर प्लग बना देता है, जिससे फ्लोएम द्वारा स्थानांतरित हो रहे खाद्य पदार्थों की हानि रुक जाती है। अतः माना जाता है कि क्षति होने पर इसका कार्य बंद करने का है।

निम्नलिखित में से सही युग्म चुनिए।

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(d) द्वितीयक जाइलम की वार्षिक वृद्धि उन क्षेत्रों में स्पष्ट होती है जहाँ दो ऋतुएँ होती हैं, एक अनुकूल (वसंत अथवा वर्षा ऋतु) तथा दूसरी प्रतिकूल (शरद, शीत तथा शुष्क ग्रीष्म)। एक वर्ष में बनी काष्ठ दो प्रकार की होती है, वसंत काष्ठ तथा शरद काष्ठ। वसंत अथवा पूर्व काष्ठ शरद अथवा पश्च काष्ठ से कहीं अधिक चौड़ी होती है। यह हल्के रंग की तथा कम घनत्व की होती है। वसंत काष्ठ में बड़े तथा चौड़े जाइलम अवयव होते हैं। शरद अथवा पश्च काष्ठ गहरे रंग की तथा अधिक घनत्व की होती है। इसमें सघन रूप से व्यवस्थित छोटे तथा संकरे अवयव होते हैं जिनकी भित्तियाँ तुलनात्मक रूप से मोटी होती हैं। शरद काष्ठ में वाहिनिकाएँ तथा रेशे वसंत काष्ठ की तुलना में अधिक प्रचुर होते हैं।

द्विबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि आगे बढ़ने पर, मोटाई।

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(b) काष्ठीय तने में द्वितीयक वृद्धि के कारण द्वितीयक जाइलम तने का अधिकांश भाग बनाता है तथा इसे सामान्यतः काष्ठ कहते हैं। द्वितीयक जाइलम में वाहिकाएँ, वाहिनिकाएँ, काष्ठ मृदूतक तथा काष्ठ रेशे होते हैं। पादप की आयु के साथ द्वितीयक जाइलम की चौड़ाई निरंतर बढ़ती है। पुराने तनों में काष्ठ (अथवा द्वितीयक जाइलम) दो क्षेत्रों में विभेदित हो जाती है - बाहरी हल्के रंग की नई रसकाष्ठ तथा भीतरी गहरे रंग की पुरानी अंतःकाष्ठ। अंतःकाष्ठ की जाइलम वाहिकाएँ तथा वाहिनिकाएँ अक्रियाशील हो जाती हैं क्योंकि वे आसपास की जीवित मृदूतकी कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न रेजिन, टैनिन, गोंद आदि से तथा टाइलोसिस के कारण भर जाती हैं। मृदूतक कोशिकाओं की मृत्यु के साथ रसकाष्ठ की प्रकृति में परिवर्तन होते हैं और इन परिवर्तनों के पूर्ण होने पर अंतःकाष्ठ बनती है। इस प्रकार रसकाष्ठ का अंतःकाष्ठ में परिवर्तन एक क्रमिक परिघटना है जो पादप के पूरे जीवनकाल चलती रहती है। प्रारंभ में रसकाष्ठ तथा अंतःकाष्ठ दोनों का आकार बढ़ता है परंतु जब वृक्ष एक निश्चित आयु पर पहुँचता है तो अंतःकाष्ठ की मात्रा निरंतर बढ़ती है तथा रसकाष्ठ की मात्रा लगभग स्थिर रहती है।

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Frequently Asked Questions

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