298 K पर सेल का EMF ज्ञात कीजिए
(A) ऐनोड :
कैथोड :
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298 K पर सेल का EMF ज्ञात कीजिए
(A) ऐनोड :
कैथोड :
एक सेल Cu में प्रारंभ में तथा आयन हैं। 4825 sec तक 10 amp धारा प्रवाहित करने के बाद सेल विभव में परिवर्तन है :
मोलों की संख्या
अभिकथन : फ्लुओराइडों से रासायनिक ऑक्सीकरण द्वारा फ्लुओरीन नहीं बनाई जा सकती।
कारण : अपने अत्यधिक धनात्मक मानक विभव के कारण फ्लुओरीन प्रबलतम ऑक्सीकारक है।
A). अपने अत्यधिक धनात्मक मानक विभव के कारण फ्लुओरीन प्रबलतम ऑक्सीकारक है। अतः फ्लुओरीन में अपचयित होकर बनने की सर्वाधिक प्रवृत्ति है , फलस्वरूप, आयन में ऑक्सीकृत होने की न्यूनतम प्रवृत्ति है। इसीलिए फ्लुओराइडों से रासायनिक ऑक्सीकरण द्वारा फ्लुओरीन नहीं बनाई जा सकती।
निम्नलिखित में से कौन-सी प्रक्रिया संक्षारण का उदाहरण नहीं है?
संक्षारण में ऑक्सीकरण के कारण धातुओं की सतह ऑक्साइडों या अन्य लवणों से ढक जाती है। लोहे में जंग लगना, चाँदी का मलिन होना और ताँबे पर हरी परत (पेटिना) सभी संक्षारण के उदाहरण हैं। ताँबे का विद्युत-परिष्करण ताँबे को शुद्ध करने की एक औद्योगिक प्रक्रिया है, जिसमें अशुद्ध ताँबा ऐनोड पर ऑक्सीकृत होता है और शुद्ध ताँबा कैथोड पर निक्षेपित होता है; यह संक्षारण जैसी क्षरण प्रक्रिया नहीं है। (संदर्भ में 'संक्षारण' और 'विद्युत-परिष्करण' खंड देखें।)
लोहे के संक्षारण की विद्युत-रासायनिक प्रकृति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
संदर्भ कहता है, 'ऐनोडी स्थल पर मुक्त इलेक्ट्रॉन धातु के भीतर से होकर धातु के दूसरे स्थल पर जाते हैं और H+ की उपस्थिति में ऑक्सीजन को अपचयित करते हैं...'। अतः कैथोडी अभिक्रिया, जहाँ ऑक्सीजन अपचयित होती है, के लिए H+ आयन आवश्यक हैं। लोहे का ऑक्सीकरण ऐनोडी स्थल पर होता है और ऑक्सीजन कैथोडी स्थल पर अपचयित होती है। जंग ($\text{Fe}_2\text{O}_3\cdot x\text{H}_2\text{O}$) वायुमंडलीय ऑक्सीजन द्वारा $\text{Fe}^{2+}$ के $\text{Fe}^{3+}$ में आगे ऑक्सीकरण से बनता है। (लोहे के संक्षारण रसायन की विस्तृत व्याख्या देखें।)
लोहे में जंग लगने की प्रक्रिया में, प्राथमिक विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया के लिए समग्र मानक सेल विभव ($E^o_{cell}$) है:
पाठ ऐनोड अभिक्रिया ($\text{Fe}^{2+}/\text{Fe}$) के लिए मानक इलेक्ट्रोड विभव $E^o = -0.44 V$ और कैथोड अभिक्रिया ($ \text{O}_2|\text{H}_2\text{O} \text{, } \text{H}^+$) के लिए $E^o = 1.23 V$ देता है। समग्र अभिक्रिया $\text{2Fe(s)} + \text{O}_2\text{(g)} + \text{4H}^+\text{(aq)} \longrightarrow \text{2Fe}^{2+}\text{(aq)} + \text{2H}_2\text{O(l)}$ है। मानक सेल विभव $E^o_{cell} = E^o_{cathode} - E^o_{anode} = 1.23 V - (-0.44 V) = 1.67 V$ है। ('संक्षारण' खंड और $E^o_{cell}$ के समीकरण देखें।)
लोहे के संक्षारण में $\text{H}^+$ आयनों की भूमिका का सही वर्णन निम्नलिखित में से कौन-सा कथन करता है?
पाठ कहता है: 'ऐनोडी स्थल पर मुक्त इलेक्ट्रॉन धातु के भीतर से होकर धातु के दूसरे स्थल पर जाते हैं और H+ की उपस्थिति में ऑक्सीजन को अपचयित करते हैं... कैथोड: O2(g) + 4 H+(aq) + 4 e⁻ → 2 H2O (l)'। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कैथोड पर ऑक्सीजन के अपचयन को सुगम बनाने के लिए $\text{H}^+$ आयन उपभुक्त होते हैं। संदर्भ में फेरस आयनों के फेरिक आयनों में ऑक्सीकृत होने पर 'हाइड्रोजन आयनों के आगे उत्पादन' का भी उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि वे केवल 'उत्पन्न' नहीं होते बल्कि एक चक्र में सम्मिलित रहते हैं। (लोहे के संक्षारण रसायन की विस्तृत व्याख्या देखें।)
जंग, जो लोहे के संक्षारण का उत्पाद है, रासायनिक रूप से निरूपित किया जाता है:
पाठ स्पष्ट रूप से कहता है: 'फेरस आयन वायुमंडलीय ऑक्सीजन द्वारा आगे फेरिक आयनों में ऑक्सीकृत हो जाते हैं, जो हाइड्रेटेड फेरिक ऑक्साइड ($\text{Fe}_2\text{O}_3 \cdot x\text{H}_2\text{O}$) के रूप में जंग बनकर बाहर आते हैं'।
लोहे को संक्षारण से बचाने के लिए बलिदानी इलेक्ट्रोड के रूप में निम्नलिखित में से कौन-सी धातु सबसे प्रभावी होगी?
किसी धातु को बलिदानी इलेक्ट्रोड के रूप में कार्य करने के लिए वह लोहे की तुलना में अधिक आसानी से ऑक्सीकृत होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि उसका मानक अपचयन विभव लोहे से अधिक ऋणात्मक (या कम धनात्मक) होना चाहिए। परिशिष्ट और संदर्भ से, लोहे का $\text{Fe}^{2+}/\text{Fe}$ के लिए मानक अपचयन विभव = -0.44 V है। विकल्पों की तुलना: Cu (+0.34 V), Ni (-0.23 V), Zn (-0.76 V), Ag (+0.80 V)। विकल्पों में जिंक (-0.76 V) का अपचयन विभव सबसे अधिक ऋणात्मक है, जो दर्शाता है कि यह सबसे आसानी से ऑक्सीकृत होता है, अतः यह सबसे प्रभावी बलिदानी इलेक्ट्रोड होगा। ('संक्षारण की रोकथाम' खंड और मानक विभवों के लिए परिशिष्ट III देखें।)
जब लोहा संक्षारित होता है, तो जल में घुली वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड की क्या भूमिका होती है?
संदर्भ कहता है: 'H+ (जो वायु से कार्बन डाइऑक्साइड के जल में घुलने से बने H2CO3 से उपलब्ध माना जाता है।' यह दर्शाता है कि घुली कार्बन डाइऑक्साइड कार्बोनिक अम्ल बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देती है, जो फिर कैथोडी अभिक्रिया के लिए आवश्यक $\text{H}^+$ आयन प्रदान करता है। (लोहे के संक्षारण में कैथोडी अभिक्रिया की व्याख्या देखें।)
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