वायु परागण किसमें सामान्य है
अजैविक परागणों में वायु द्वारा परागण (वायु परागण) अधिक सामान्य है। वायु परागण घासों में काफी सामान्य है।
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वायु परागण किसमें सामान्य है
अजैविक परागणों में वायु द्वारा परागण (वायु परागण) अधिक सामान्य है। वायु परागण घासों में काफी सामान्य है।
बीजांडकायी बहुभ्रूणता किस वंश की जातियों में सूचित की गई है
किसी बीज में एक से अधिक भ्रूण का होना बहुभ्रूणता कहलाता है। अनेक Citrus तथा आम की किस्मों में भ्रूणकोश को घेरने वाली कुछ बीजांडकाय कोशिकाएँ विभाजित होने लगती हैं, भ्रूणकोश में प्रवेश कर जाती हैं तथा भ्रूणों में विकसित हो जाती हैं; ऐसी जातियों में प्रत्येक बीजांड में अनेक भ्रूण होते हैं (बीजांडकायी बहुभ्रूणता)।
निम्नलिखित में से किसमें परागण स्वपरागण होता है?
वे द्विलिंगी पुष्प जो सदैव बंद रहते हैं, अनुन्मील पुष्प कहलाते हैं तथा पुष्पों की ऐसी दशा अनुन्मील परागण कहलाती है। ऐसे पुष्पों में परागकोश तथा वर्तिकाग्र एक-दूसरे के निकट होते हैं। जब कलिकाओं में परागकोश स्फुटित होते हैं, तो परागकण वर्तिकाग्र के संपर्क में आकर परागण कर देते हैं। अतः अनुन्मील पुष्प सदैव स्वपरागित होते हैं।
परागकोश से उसी पादप के दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण कहलाता है
सजातपुष्पी परागण (ग्रीक geiton = पड़ोसी तथा gameiu = विवाह करना) में परागकणों का स्थानांतरण एक नर पुष्प से उसी पादप पर उत्पन्न दूसरे मादा पुष्प के वर्तिकाग्र तक होता है। अतः सजातपुष्पी परागण केवल उभयलिंगाश्रयी पादपों में होता है, अर्थात् वे पादप जिनमें नर तथा मादा पुष्प भिन्न स्थानों पर किंतु एक ही पादप पर लगते हैं, जैसे, मक्का (Zea mays)। जंतु-परागित तंत्र में यह उसी पादप के अनेक पुष्पों पर जाने वाले परागणक द्वारा संपन्न होता है। यह वायु-परागित जातियों में भी संभव है।
वायु-परागित पुष्प होते हैं
वायु के माध्यम से होने वाला परागण वायु परागण कहलाता है, जैसे, Zea mays, Cannabis, Pinus, आदि। वायु-परागित पुष्पों के कुछ लक्षण हैं -
(i) बाह्यदलपुंज, दलपुंज तथा सहपत्र, सहपत्रक जैसे अनावश्यक चक्र दिखावटी नहीं होते।
(ii) परिदल खंड अविकसित या ह्रासित होते हैं और कभी-कभी अनुपस्थित।
(iii) पुष्पों में गंध तथा मकरंद नहीं होते।
(iv) पादप बहुत बड़ी मात्रा में धूल जैसे परागकण उत्पन्न करते हैं।
(v) परागकण शुष्क, अत्यंत छोटे, चिपचिपे-रहित तथा अभिगीले होते हैं
ये लक्षण परागकणों की पृथक्ता के लिए सहायक होते हैं।
निम्नलिखित में से कौन-सा पादप उभयलिंगाश्रयी है?
Pinus उभयलिंगाश्रयी है, जिसमें नर शंकु तथा मादा शंकु दोनों एक ही वृक्ष पर अलग-अलग शाखाओं पर लगते हैं। Marchantia Cycs तथा पपीता एकलिंगाश्रयी पादप हैं।
पादप संरचनाओं के निम्नलिखित में से किस युग्म में गुणसूत्रों की अगुणित संख्या होती है?
आवृतबीजियों में बीजांड के भीतर एक द्विगुणित गुरुबीजाणु मातृ कोशिका परिपक्व होती है। अर्धसूत्रण द्वारा यह चार गुरुबीजाणु (अगुणित) बनाती है। अधिकांश पादपों में इनमें से केवल एक ही गुरुबीजाणु जीवित रहता है। यह क्रियाशील गुरुबीजाणु समसूत्रण द्वारा तीन बार विभाजित होकर आठ अगुणित केंद्रक बनाता है जो 7-कोशिकीय भ्रूणकोश में बंद रहते हैं। एक केंद्रक भ्रूणकोश के छिद्र के पास अंड कोशिका में स्थित होता है। दो केंद्रक भ्रूणकोश के मध्य में एक ही कोशिका में स्थित होते हैं और ध्रुवीय केंद्रक कहलाते हैं, दो केंद्रक अंड कोशिका के दोनों ओर स्थित सहायक कोशिकाओं में होते हैं तथा शेष तीन केंद्रक अंड कोशिका के विपरीत भ्रूणकोश के सिरे पर स्थित प्रतिमुखी कोशिकाओं में रहते हैं।
बीजांडकाय बीजांड में अध्यावरणों से ढकी पतली भित्ति वाली मृदूतकीय कोशिकाओं का केंद्रीय रूप से स्थित पुंज है।
विकसित हो रहे भ्रूण द्वारा भ्रूणपोष किसके बीज में खप जाता है
भ्रूणपोष, यदि उपस्थित हो, तो बीज के भोजन संचय ऊतक का कार्य करता है। भ्रूणपोष वाले बीज भ्रूणपोषी या एल्ब्युमिनी कहलाते हैं (जैसे, Cocos nucifera, Ricinus communis, Zea mays तथा अन्य अनाज), जबकि भ्रूणपोष रहित बीज अभ्रूणपोषी या अनएल्ब्युमिनी बीज कहलाते हैं (जैसे, Brassica campestris, Arachis hypogea, Pisum sativum)।
अरंडी (Ricinus communis) में भ्रूणपोष श्वेत मृदु पुंज होता है जो तैलीय संचित भोजन से समृद्ध होता है।
मक्का में भ्रूणपोष पीले रंग का होता है, भ्रूणपोष की सबसे बाहरी परत एल्यूरोन परत कहलाती है, जो प्रोटीन से समृद्ध होती है।
पुष्पों की एकलिंगता किसे रोकती है
परागकोश से वर्तिकाग्र तक पराग का स्थानांतरण परागण कहलाता है। स्वपरागण में एक पुष्प के परागकणों का स्थानांतरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र तक होता है। स्वपरागण केवल द्विलिंगी पुष्पों में होता है।
सजातपुष्पी परागण में परागकणों का स्थानांतरण एक नर पुष्प से उसी पादप के मादा पुष्प के वर्तिकाग्र तक होता है। अतः सजातपुष्पी परागण केवल उभयलिंगाश्रयी पादपों में होता है, अर्थात्, वे पादप जिनमें नर तथा मादा पुष्प भिन्न स्थानों पर लगते हैं।
परपुष्पी परागण में एक नर पुष्प के परागकणों का स्थानांतरण आनुवंशिक रूप से भिन्न मादा पुष्प के वर्तिकाग्र तक होता है। यह वायु, जल, कीट आदि विभिन्न कारकों के माध्यम से होता है।
निम्नलिखित में से कौन एंजाइम की क्रिया के प्रति प्रतिरोधी है?
पराग भित्ति दो परतों से बनी होती है — बाहरी बाह्यचोल तथा भीतरी अंतःचोल। बाह्यचोल मुख्यतः स्पोरोपोलेनिन से बना होता है, जो कैरोटीनॉइडों के ऑक्सीकारी बहुलकीकरण से बनता है। स्पोरोपोलेनिन ज्ञात जैविक पदार्थों में सर्वाधिक प्रतिरोधी में से एक है। बाह्यचोल आरंभ में पतला होता है किंतु परिपक्वता के साथ बहुत मोटा हो जाता है।
रंभ-बाह्य क्षेत्र में द्वितीयक वृद्धि के दौरान काग एधा या फेलोजन कोशिकाएँ समानांतर रूप से विभाजित होकर बाहर तथा भीतर की ओर कोशिकाएँ बनाती हैं। बाहर की ओर बनी कोशिकाएँ सुबेरिनयुक्त एवं मृत होकर काग बनाती हैं। सुबेरिन के कारण काग जल के लिए अपारगम्य होता है तथा नीचे के ऊतकों को सुरक्षा प्रदान करता है।
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