NEET प्रश्न (MCQ) हिंदी में — उत्तर और विस्तृत हल सहित

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परागकण ताप की चरम दशाओं तथा निर्जलीकरण को सह पाते हैं क्योंकि उनका बाह्यचोल किससे बना होता है

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बाह्यचोल परागकण की बाहरी परत है जो ऐसीटोलिसिस-प्रतिरोधी परत है। यह भौतिक तथा जैविक अपघटन के प्रति भी प्रतिरोधी है। बाह्यचोल के इसी गुण के कारण परागकण जीवाश्म निक्षेपों में लंबे समय तक भली-भाँति परिरक्षित मिलते हैं।

परागनलिका सामान्यतः भ्रूणकोश में कैसे प्रवेश करती है

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भ्रूणकोश की भित्ति में प्रवेश करने के बाद परागनलिका भ्रूणकोश में प्रवेश के दौरान बीजांडकाय कोशिकाओं तथा सहायक कोशिकाओं से होकर गुजरती है, जैसे Fagopyrum. परागनलिका अंड तथा एक सहायक कोशिका के बीच से गुजरती है। Cardiospermum में यह भ्रूणकोश भित्ति तथा सहायक कोशिका के बीच से गुजरती है। Oxalis में यह सीधे एक सहायक कोशिका से होकर जाती है। Viola में यह एक सहायक कोशिका में प्रवेश करके उसके आधार से होकर मार्ग बनाती है। सामान्य दशाओं में परागनलिका के आघात से केवल एक सहायक कोशिका नष्ट होती है तथा दूसरी कुछ समय बाद तक अक्षत बनी रहती है।

किसी दिए गए पादप के आनुवंशिक लक्षणों को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सी विधि सामान्यतः प्रयुक्त होती है?

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किसी दिए गए पादप के आनुवंशिक लक्षणों को बनाए रखने के लिए कायिक गुणन द्वारा प्रवर्धन प्रयुक्त होता है। इससे आनुवंशिक रूप से एकसमान समष्टि अथवा क्लोन बनता है। बीजों द्वारा प्रवर्धित पादपों में अर्धसूत्रण के दौरान जीनों के यादृच्छिक पृथक्करण तथा निषेचन के दौरान उनके यादृच्छिक संयोजन के कारण विविधताएँ आ जाती हैं।

 

लेजर किरण से जनन कोशिका को नष्ट कर देने के बाद भी पुष्पी पादप का परागकण अंकुरित होकर सामान्य परागनलिका बनाता है क्योंकि

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(d)  परागण के पश्चात् के परिवर्धन के दौरान परागकण का अंकुरण होता है। परागकण वर्तिकाग्र पर वर्तिकाग्री स्राव से अपने जनन छिद्रों द्वारा जल तथा पोषक अवशोषित करता है। नलिका या कायिक कोशिका बढ़कर किसी एक जनन छिद्र या जनन खाँच से परागकण के बाहर निकलकर परागनलिका बनाती है। जनन कोशिका परागनलिका नहीं बनाती, बल्कि वह परागनलिका में चली जाती है तथा विभाजित होकर 2 नर युग्मक बनाती है। अतः लेजर किरण से जनन कोशिका को नष्ट कर देने के बाद भी परागकण सामान्य परागनलिका बनाता है क्योंकि कायिक कोशिका को क्षति नहीं पहुँची है।

अनुन्मील परागण पुष्पोन्मीलन पर वरीयता रखता है क्योंकि

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अनुन्मील पुष्प बिल्कुल नहीं खुलते। ऐसे पुष्पों में परागकोश तथा वर्तिकाग्र एक-दूसरे के निकट होते हैं। जब कलिकाओं में परागकोश स्फुटित होते हैं, तो परागकण वर्तिकाग्र के संपर्क में आकर परागण कर देते हैं। अतः अनुन्मील पुष्प स्वपरागित होते हैं और पर-परागण की कोई संभावना नहीं रहती। इसलिए इन पुष्पों में किसी परागण कारक की आवश्यकता नहीं होती।

स्पोरोपोलेनिन पराग बाह्यचोल का एक घटक है।

यह किसकी क्रिया द्वारा अपघटित हो सकता है 

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परागकण की बाहरी परत बाह्यचोल कहलाती है। यह मोटी, चिकनी तथा उपत्वचायुक्त होती है। यह क्यूटिन स्पोरोपोलेनिन कहलाता है। यह किसी भी एंजाइम द्वारा अपघटित नहीं होता। उच्च ताप, प्रबल अम्ल या प्रबल क्षार का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अतः यह रासायनिक तथा जैविक अपघटन के प्रति प्रतिरोधी है। स्पोरोपोलेनिन के कारण परागकण सूक्ष्मजीवाश्मों के रूप में भली-भाँति परिरक्षित रहते हैं।

धान तथा गेहूँ के परागकण मुक्त होने के ___ मिनट में अपनी जीवन-क्षमता खो देते हैं।

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पराग जीवन-क्षमता वह अवधि है जिस तक परागकण अंकुरित होने की क्षमता बनाए रखते हैं। कलिका अवस्था में परागित होने वाले पुष्पों में पराग जीवन-क्षमता कम होती है। धान तथा गेहूँ में यह 30 मिनट है। यह ताप एवं आर्द्रता की पर्यावरणीय दशाओं पर निर्भर करती है।

आवृतबीजियों में मादा युग्मकोद्भिद के निर्माण का सही अनुक्रम क्या है?

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आवृतबीजियों में बीजांड का शरीर मृदूतकीय कोशिकाओं के पुंज से बना होता है जिसे बीजांडकाय कहते हैं। बीजांडकाय के अधश्चर्मी क्षेत्र में बीजांडद्वारी सिरे की ओर एक प्राथमिक आर्किस्पोरियल कोशिका विकसित होती है, जो आगे विभाजनों द्वारा द्विगुणित गुरुबीजाणु मातृ कोशिका बनाती है। यह अर्धसूत्रण द्वारा गुरुबीजाणु चतुष्क बनाती है। सामान्यतः निभागी गुरुबीजाणु क्रियाशील रहता है जबकि शेष तीन अपह्रासित हो जाते हैं। क्रियाशील गुरुबीजाणु मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोश) की प्रथम कोशिका है।

प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) किसके संलयन से बनता है

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आवृतबीजियों में द्विनिषेचन की घटना के दौरान दूसरा नर युग्मक केंद्रीय कोशिका के दो अगुणित ध्रुवीय केंद्रकों अथवा द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक से संलयित होकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) बनाता है। इस दूसरे निषेचन को कायिक निषेचन कहते हैं।

वह विकल्प चुनिए जिसमें वे सभी पादप हैं जो अभ्रूणपोषी बीज उत्पन्न करते हैं।

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अभ्रूणपोषी या अनएल्ब्युमिनी बीजों में अवशिष्ट भ्रूणपोष नहीं होता क्योंकि वह भ्रूण परिवर्धन के दौरान पूर्णतः खप जाता है। चना, मटर, सेम तथा मूँगफली में अभ्रूणपोषी बीज होते हैं।

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Frequently Asked Questions

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