भौतिक विज्ञान (Physics) NEET प्रश्न हिंदी में — उत्तर सहित MCQ अभ्यास

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जब किसी शुद्ध प्रेरकीय परिपथ पर AC वोल्टता लगाई जाती है, तो धारा अपने अधिकतम मान पर वोल्टता से आवर्तकाल के _________ _________ पहुँचती है।

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दिए गए पाठ के अनुसार, 'हम देखते हैं कि धारा अपने अधिकतम मान पर वोल्टता से आवर्तकाल के एक-चौथाई बाद पहुँचती है $T/4 = \pi/(2\omega)$'।

AC वोल्टता के एक पूर्ण चक्र में शुद्ध प्रेरक को दी गई औसत शक्ति क्या है?

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पाठ कहता है, 'अतः एक पूर्ण चक्र में औसत शक्ति $(P_L) = \text{average of } [- (v_m i_m/2) \sin(2\omega t)]$ = 0 है, क्योंकि एक पूर्ण चक्र में $\sin (2\omega t)$ का औसत शून्य होता है। इस प्रकार, एक पूर्ण चक्र में प्रेरक को दी गई औसत शक्ति शून्य है'।

शुद्ध प्रेरक का प्रेरकीय प्रतिघात ($X_L$) किसके अनुक्रमानुपाती होता है:

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उदाहरण प्रेरकीय प्रतिघात की गणना $X_L = 2\pi \nu L$ के रूप में करता है। यह सूत्र स्पष्ट दर्शाता है कि प्रेरकीय प्रतिघात AC स्रोत की आवृत्ति ($\nu$) के अनुक्रमानुपाती है।

शुद्ध प्रेरकीय AC परिपथ में वोल्टता और धारा के बीच कला संबंध के विषय में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

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पाठ में उल्लेख है, 'प्रेरक की स्थिति में धारा वोल्टता से $\pi/2$ पीछे रहती है'। यह कहने के तुल्य है कि वोल्टता धारा से $\pi/2$ आगे है।

25.0 mH का एक शुद्ध प्रेरक 50 Hz आवृत्ति वाले 220 V AC स्रोत से जुड़ा है। प्रेरकीय प्रतिघात क्या है?

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उदाहरण 7.2 से: $X_L = 2\pi \nu L = 2 \times 3.14 \times 50 \times 25 \times 10^{-3} \Omega = 7.85 \Omega$।

AC परिपथों में फेज़रों का उपयोग मुख्यतः इसलिए किया जाता है:

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पाठ कहता है, 'ac परिपथ में वोल्टता और धारा के बीच कला संबंध दर्शाने के लिए हम फेज़रों की धारणा का उपयोग करते हैं। फेज़र आरेख के उपयोग से ac परिपथ का विश्लेषण सुगम हो जाता है।'

शुद्ध प्रेरकीय AC परिपथ में, किरखोफ़ के लूप नियम के अनुसार, यदि स्रोत के सिरों पर वोल्टता $v = v_m \sin \omega t$ हो, तो स्व-प्रेरित EMF का समीकरण है:

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खंड 'AC VOLTAGE APPLIED TO AN INDUCTOR' में कहा गया है कि 'प्रेरक में स्व-प्रेरित फैराडे emf' $L \frac{di}{dt}$ है। शुद्ध प्रेरक के लिए किरखोफ़ का लूप नियम लगाने पर, $v - L \frac{di}{dt} = 0$, अतः $v = L \frac{di}{dt}$।

यदि किसी प्रेरक के भीतर लोहे की छड़ डाल दी जाए, प्रतिरोध नगण्य मानते हुए, तो उसके प्रेरकीय प्रतिघात का क्या होता है?

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उदाहरण 7.5 कहता है, 'जैसे ही लोहे की छड़ डाली जाती है, कुंडली के भीतर का चुंबकीय क्षेत्र लोहे को चुंबकित कर देता है जिससे उसके भीतर चुंबकीय क्षेत्र बढ़ जाता है। अतः कुंडली का प्रेरकत्व बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप कुंडली का प्रेरकीय प्रतिघात बढ़ जाता है।'

जब AC स्रोत (और प्रेरक) के साथ श्रेणीक्रम में जुड़े बल्ब वाले परिपथ के प्रेरक में लोहे की छड़ डाली जाती है, तो बल्ब की चमक का क्या होता है?

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उदाहरण 7.5 के अनुसार: 'परिणामस्वरूप, लगाई गई ac वोल्टता का बड़ा अंश प्रेरक के सिरों पर प्रकट होता है, जिससे बल्ब के सिरों पर कम वोल्टता बचती है। अतः बल्ब की चमक घट जाती है।'

शुद्ध प्रेरकीय परिपथ एक आदर्श परिपथ स्थिति है। वास्तविकता में, प्रेरकों में प्रायः होता है:

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पाठ में उल्लेख है, 'प्रायः प्रेरकों की कुंडलियों में पर्याप्त प्रतिरोध होता है, परंतु हम मानेंगे कि इस प्रेरक का प्रतिरोध नगण्य है' (आदर्श शुद्ध प्रेरकीय परिपथ विश्लेषण के प्रयोजन से)।

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